रात के सन्नाटे में पुरानी फैक्ट्री किसी कब्र की तरह खामोश थी। हवा में जंग और खून की गंध घुली थी। दीवारों पर जाले लटके थे, और टूटी खिड़कियों से आती ठंडी हवा जैसे किसी रूह की फुसफुसाहट हो। वहीं, फैक्ट्री के बीचोंबीच कबीर खड़ा था — चेहरा शांत, लेकिन आँखों में पागलपन। उसके हाथों से टपकता खून ज़मीन पर पड़े आर्यन के lifeless शरीर पर गिर रहा था। वही आर्यन, जिसका हाथ कभी उसने कसकर थामा था — “भाई, कभी धोखा नहीं देंगे।”

पर आज उसी हाथ ने दोस्त की साँसें छीन ली थीं। सब कुछ शुरू हुआ था मायरा से — वो लड़की जो ख़ामोशी में भी कहानियाँ कहती थी। उसकी मुस्कान में रहस्य था, और उसकी आँखों में आग। कबीर और आर्यन — दोनों उस आग में जलने लगे। मायरा ने दोनों को मना किया, कहा, “मैं किसी की नहीं बन सकती।” पर कबीर के लिए “ना” सिर्फ़ एक चुनौती थी।
धीरे-धीरे उसकी सोच ज़हर बन गई। उसे लगता था आर्यन उसकी राह में काँटा है। एक रात उसने आर्यन को उसी फैक्ट्री में बुलाया, जहाँ आज मौत उसका इंतज़ार कर रही थी। आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा, “चल सब भूल जाते हैं, दोस्ती फिर से शुरू करते हैं।” लेकिन कबीर की आँखों में अब इंसान नहीं, राक्षस उतर चुका था। उसने बिना बोले लोहे की रॉड उठाई — और वार किया। आवाज़ आई, “कबीर… भाई…” — और फिर बस खामोशी।
कबीर ने लाश को टैंक में डाल दिया। अगले दिन वो कॉलेज में हँस रहा था, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। लेकिन कुछ हफ़्तों बाद, सब बदल गया। शीशे में आर्यन दिखने लगा, दीवारों पर खून के निशान उभरने लगे, और रात में वही आवाज़ — “तू जीता नहीं, कबीर… तू मरा है।”
कबीर पागल होने लगा। एक रात वो फिर फैक्ट्री पहुँचा। दरवाज़ा अपने आप खुला, टैंक से खून रिस रहा था। पीछे से आवाज़ आई — “भाई…”
कबीर ने मुड़कर देखा — आर्यन वहीं खड़ा था, वही चेहरा, बस ठंडा और बेजान। उसने आगे बढ़कर कहा — “अब बारी मेरी है।”
अगले दिन फैक्ट्री में सिर्फ़ एक लाश मिली — कबीर की। दीवार पर खून से लिखा था —
“अब सच में जीत मेरी है।”
कहते हैं, प्यार में सबसे खतरनाक चीज़ होती है अहंकार।
कबीर ने आर्यन को मारा, पर मरा वो खुद।
कभी-कभी मौत से बड़ी सज़ा — खुद की रूह से मुलाक़ात होती है।








