“भरोसे की कब्र” (Part – 1)

कॉलेज के दिनों में आरव और सिया की जोड़ी सबकी पसंद थी। दोनों हमेशा साथ दिखते थे — लाइब्रेरी में, कैंटीन में, और हर फेस्ट में। दोस्ती धीरे-धीरे प्यार में बदल गई और दोनों ने शादी कर ली। शादी के बाद भी उनकी लाइफ किसी फिल्म से कम नहीं थी — हँसी, प्यार, और भरोसे से भरी।

“भरोसे की कब्र” (Part – 1)

लेकिन ज़िंदगी हमेशा परफेक्ट नहीं रहती। एक शाम आरव अपने ऑफिस से घर लौटा ही था कि उसके फ़ोन पर एक अनजान नंबर से कॉल आई। आरव शॉवर लेने जा ही रहा था, इसलिए कॉल सिया ने उठा ली। उधर से एक लड़की की आवाज़ आई — “आरव, तुम कल रात कहाँ गायब हो गए थे?

सिया का चेहरा पल भर में सख़्त हो गया। जब आरव बाहर आया, तो उसके सामने सवालों का तूफ़ान था। आरव ने बहुत समझाया — “सिया, मैं उस लड़की को जानता भी नहीं। शायद किसी ने गलत नंबर डायल कर दिया होगा।”
शुरू में सिया चुप रही, लेकिन उसके मन में शक का बीज बो दिया गया था।

दिन गुज़रते गए, पर वो घटना उसके ज़ेहन से नहीं निकली। छोटी-छोटी बातों में उसे अब आरव पर शक होने लगा। आरव देर से आए तो पूछताछ शुरू, मोबाइल देखा जाए तो बेचैनी। आरव के लिए ये सब सहना मुश्किल था, पर वो सिया को खोना नहीं चाहता था।

इसी बीच, सिया की ज़िंदगी में नया किरदार आया — उनका पड़ोसी “कुणाल”। कुणाल उससे हर दिन बात करने लगा, छोटी-छोटी मदद करता, और वो सब बातें सुनता जो सिया किसी से नहीं कह पाती थी। सिया को लगा कि कुणाल उसे समझता है, जबकि आरव अब उसे सिर्फ़ सफ़ाई देता है।

धीरे-धीरे सिया और कुणाल के बीच नज़दीकियाँ बढ़ने लगीं, और आरव से उसकी दूरी। आरव समझ नहीं पा रहा था कि उसकी सिया अब पहले जैसी क्यों नहीं रही। रातें बेचैनी में गुज़रने लगीं, और दिन संदेह में।

एक शाम आरव घर लौटा तो दरवाज़ा खुला था, घर बिखरा हुआ, और सिया कहीं नहीं थी। टेबल पर बस एक नोट पड़ा था —
“अब मैं वहाँ जा रही हूँ जहाँ मुझे शक नहीं, सुकून मिलेगा…”

पर किसी को नहीं पता था, उस “सुकून” की कहानी अब खून में बदलने वाली है।
क्योंकि सिया और कुणाल ने जो प्लान बनाया था…
वो प्यार नहीं, साज़िश थी।

(Part 2 में जारी रहेगा — जहाँ शुरू होगा “Crime का असली खेल…”)

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *